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खुद को discipline मे रखो || Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj
खुद को Discipline में रखो
— श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज
आज मनुष्य के जीवन में जितनी भी समस्याएँ दिखाई देती हैं—चाहे वह मानसिक अशांति हो, असंतोष हो, असफलता हो या आध्यात्मिक खालीपन—उन सबका मूल कारण एक ही है: अनुशासन का अभाव। हमारे पास साधन हैं, अवसर हैं, ज्ञान है, फिर भी जीवन बिखरा हुआ है। इसी बिखराव को रोकने का सरल, लेकिन गहरा उपाय बताते हैं श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, जब वे कहते हैं—
“खुद को discipline में रखो।”
यह वाक्य केवल व्यवहारिक जीवन के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।
अनुशासन: बाहरी नहीं, आंतरिक यात्रा
अक्सर लोग अनुशासन को बाहरी नियमों से जोड़ देते हैं—समय पर उठना, नियम से काम करना, नियम से खाना। ये सब जरूरी हैं, लेकिन महाराज जी का अनुशासन इससे कहीं गहरा है।
वह कहते हैं कि:
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असली अनुशासन मन का होता है
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विचारों का होता है
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इच्छाओं का होता है
अगर मन अनियंत्रित है, तो बाहरी नियम केवल दिखावा बन जाते हैं।
मन का स्वभाव और अनुशासन की आवश्यकता
मन स्वभाव से चंचल है। वह आज कुछ चाहता है, कल कुछ और।
आज भक्ति में मन लगता है, कल भोग में।
यही अस्थिरता दुख का कारण बनती है।
श्री हित प्रेमानंद जी महाराज समझाते हैं कि:
“मन को खुला छोड़ देना, स्वयं को दुख के हवाले करना है।”
जब हम मन को अनुशासन में रखते हैं, तब हम उसे दिशा देते हैं।
और दिशा मिलने पर ही मन शांति अनुभव करता है।
अनुशासन और भक्ति का गहरा संबंध
बहुत से लोग कहते हैं—“भक्ति तो प्रेम है, उसमें नियम क्यों?”
महाराज जी इसका बहुत सुंदर उत्तर देते हैं।
वे कहते हैं कि:
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प्रेम बीज है
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और अनुशासन उसकी रक्षा करने वाली बाड़
बिना अनुशासन के प्रेम भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है।
रोज़ का निश्चित समय,
नियमित नाम-स्मरण,
संयमित जीवन—
यही भक्ति को स्थिर और गहरा बनाते हैं।
भोग से योग की यात्रा अनुशासन से ही होती है
आज का मनुष्य भोग में डूबा हुआ है। मोबाइल, मनोरंजन, स्वाद, आराम—सब कुछ उपलब्ध है।
लेकिन जितना अधिक भोग बढ़ता है, उतनी ही बेचैनी बढ़ती है।
महाराज जी कहते हैं:
“भोग मन को कभी तृप्त नहीं करता।”
अनुशासन ही वह सेतु है जो हमें भोग से योग की ओर ले जाता है।
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सीमित भोजन
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सीमित बोलना
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सीमित इच्छाएँ
यही सीमाएँ जीवन को हल्का बनाती हैं।
समय का अनुशासन: जीवन का सबसे बड़ा साधन
समय भगवान का दिया हुआ सबसे कीमती उपहार है।
लेकिन हम उसे सबसे अधिक व्यर्थ भी करते हैं।
अनुशासन हमें सिखाता है:
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समय पर उठना
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समय पर सोना
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समय का सदुपयोग करना
महाराज जी कहते हैं कि जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है,
उसके जीवन में ईश्वर कृपा स्वतः प्रकट होने लगती है।
अनुशासन और अहंकार
अनुशासन अहंकार को भी धीरे-धीरे गलाता है।
जब हम नियम से चलते हैं, तब “मैं” पीछे हटता है और “मर्यादा” आगे आती है।
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अपनी इच्छा को रोकना
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अपने मन की बात न मानना
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नियम को प्राथमिकता देना
यही अहंकार को तोड़ता है और विनम्रता लाता है।
अनुशासन कोई सजा नहीं, एक सुरक्षा कवच है
लोग सोचते हैं कि अनुशासन जीवन को कठिन बना देता है।
लेकिन महाराज जी कहते हैं कि:
“अनुशासन जीवन को बिगड़ने से बचाता है।”
जैसे रेल पटरी पर चलती है तो सही जगह पहुँचती है,
और पटरी से उतरते ही दुर्घटना होती है—
वैसे ही जीवन में अनुशासन हमारी पटरी है।
गृहस्थ और साधक—दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक
अनुशासन केवल साधुओं के लिए नहीं है।
गृहस्थ जीवन में तो इसकी और भी अधिक आवश्यकता है।
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परिवार के प्रति कर्तव्य
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कार्य के प्रति ईमानदारी
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व्यवहार में संयम
इन सबका मूल अनुशासन ही है।
छोटे नियम, बड़ा परिवर्तन
महाराज जी हमेशा छोटे कदमों पर ज़ोर देते हैं:
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रोज़ थोड़ा जप
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रोज़ थोड़ा संयम
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रोज़ थोड़ा आत्म-निरीक्षण
यही छोटे नियम समय के साथ बड़ा परिवर्तन लाते हैं।